शिक्षा नीति और ज्ञान परम्परा संस्कृत से सम्भव है – आचार्य डॉ. शर्मा
भाषा कौशल आदि में भी सहायक है संस्कृत – प्रो.डाॅ.सुराना
दुर्ग : न्यूज़ 36 :”संस्कृत केवल एक भाषा ही नहीं, अपितु यह भारतीय ज्ञान-विज्ञान परम्परा, साहित्य और दर्शन की आधारशिला है। योग-साधना , साहित्य और संस्कृति के संरक्षण की आज भी प्रेरणा इसी से मिलती है। अनन्त काल तक भारतीय संस्कृति का संरक्षण भी ये करेगी।” ये उद्गार हैं आचार्य डॉ. महेशचन्द्र शर्मा के। साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के सन्दर्भ में देश-विदेश के अनेक सफल दौरे कर चुके आचार्य डॉ.शर्मा विगत दिवस शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर महाविद्यालय दुर्ग में संस्कृत सप्ताह के उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि की आसन्दी से बोल रहे थे।
संस्कृत विभाग एवं योग विभाग द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस समारोह में उन्होंने आगे कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-भारतीय ज्ञान परम्परा संस्कृत से प्रेरित हैं, अतः उसके बिना ये असम्भव हैं। विज्ञान, गणित, ज्योतिष, भूगोल,खगोल, राजनीति और अर्थशास्त्र का आधार भी संस्कृत है। पूर्व प्राचार्य एवं पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ.शर्मा ने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे अपनी इस स्वर्णिम विरासत से जुड़े। जड़ों से जुड़ेंगे तो उन्नति होगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुवे महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ.अभिनेष सुराना ने संस्कृत को संस्कृति और भारतीय ज्ञान परम्परा की आधारभूत भाषा बताया। प्रोफ़ेसर सुराना ने आगे कहा कि भाषा कौशल, अनुशासन, चिन्तन, तर्क और सांस्कृतिक जीवन मूल्यों के विकास में भी संस्कृत विशेष सहायक है। इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो.ए.के.पाण्डेय ने भारतीय इतिहास और संस्कृति के अध्ययन में संस्कृत को विशेष उपयोगी बताया। अनेक पुस्तकों के लेखक आचार्य डॉ.महेशचन्द्र शर्मा ने अपनी पुस्तक “छत्तीसगढ़ में संस्कृत” सभी उपस्थितों को भेंट कीं। ये वृहत् शोध परियोजना प्रतिवेदन का प्रकाशित रूप है। इसमें भारतीय ज्ञान परम्परा की भी जानकारी है।सबने इसमें रुचि और जिज्ञासा व्यक्त की।इसके पूर्व संस्कृत विद्यार्थियों ने महाविद्यालय के सभी गुरु-शिष्यों को तिलक लगाकर अनुकूल वातावरण बनाया। कार्यक्रम का सफल संचालन संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो.जनेन्द्र कुमार दीवान ने किया। योग विभागाध्यक्षा डॉ. नीरा सिंह ने आभार व्यक्त किया।
