भिलाई : न्यूज़ 36 : आज दोपहर 2 बजे *अशरफी मस्जिद, रुआबांधा* बस्ती, भिलाई में आली जनाब सैय्यद अली साहब सदर मदरसा व अशरफ़ी मस्जिद रुआबांधा के जेरे इंतज़ाम *सुन्नी उलमा कौन्सिल भिलाई* की शहर के उलमा, कुर्रा, हुफ्फाज़ और इमामों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में मुहर्रमुल हराम के दौरान डीजे, शोर-शराबा, बेपर्दगी और अन्य गलत रस्मों को रोकने के लिए एक कार्ययोजना (रोडमैप) तैयार करने पर चर्चा की गई। इसमें अशरफी मस्जिद रुआबांधा, सेक्टर-6 जामा मस्जिद, कैंप-1, 2 मस्जिद, दुर्ग जामा मस्जिद, ज़ोन-2,3 मस्जिद, भिलाई 3, फरीदिया मस्जिद, कोहका मस्जिद, मक्का मस्जिद, बोरसी, मरोदा, रिसाली, जामूल, मदरसा अशर्फिया, रायपुर नाका, हुडको, सहित विभिन्न मस्जिदों के इमाम, ख़तीब, हाफिज़ और उलमा व मदरसा ताजुल उलूम रुआबांधा भिलाई के मैनेजर सय्यद अफ़ताबुर्रब साहब शामिल हुए।
बैठक में मौजूद उलेमा और इमामों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि *डीजे और अत्यधिक तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम केवल ध्वनि प्रदूषण ही नहीं फैलाते, बल्कि लोगों की सेहत, शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था और सार्वजनिक शांति के लिए भी गंभीर खतरा बनते हैं।
उलेमा ने बताया कि वैज्ञानिक शोधों के अनुसार लगातार या अचानक तेज आवाज इंसान के दिमाग, नसों और सुनने की शक्ति पर बुरा असर डालती है। हृदय रोगियों, उच्च रक्तचाप के मरीजों और बुजुर्गों के लिए तेज आवाज बेचैनी, धड़कन बढ़ने और कई बार गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है।
अस्पतालों तथा घरों में इलाज करा रहे मरीजों के आराम और स्वास्थ्य लाभ पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि *परीक्षा की तैयारी* कर रहे विद्यार्थियों की पढ़ाई और एकाग्रता शोर के कारण प्रभावित होती है। *नवजात और छोटे बच्चों* की नींद, मानसिक विकास और शारीरिक आराम में भी बाधा आती है। गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
उलेमा ने कहा कि अत्यधिक शोर के कारण मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, घबराहट, सिरदर्द और सुनने की क्षमता में कमी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। सामाजिक दृष्टि से भी डीजे का अनावश्यक उपयोग सार्वजनिक शांति भंग करता है और विवादों तथा कानून-व्यवस्था की समस्याओं को जन्म देता है।
बैठक में शामिल उलेमा, हुफ्फाज़ और इमामों ने इस बात पर जोर दिया कि मुहर्रमुल हराम जैसे पवित्र महीने में अमन, गरिमा, गंभीरता और दीन की सही समझ को बढ़ावा दिया जाए। इसलिए मुस्लिम समाज के उलेमा, हुफ्फाज़ और इमामों ने मांग की कि शादी-विवाह, मुहर्रम के जुलूसों तथा अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में डीजे और अत्यधिक तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के उपयोग को पूरी तरह बंद किया जाए, ताकि समाज में शांति, स्वास्थ्य और भाईचारा कायम रहे।
बैठक में उलेमा ने यह भी स्पष्ट किया कि ताज़िया यानी हुबहू रौज़ा-ए-हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की प्रतिकृति बनाकर बरकत की नीयत से घरों में रखना अपने आप में निषिद्ध नहीं है, बल्कि यह हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु और वाक़िया-ए-कर्बला की याद ताज़ा करने का एक माध्यम है। लेकिन ताज़िया बनाकर उसे मिट्टी में दबा देना या पानी में बहा देना माल की बर्बादी और बेअदबी है।
इसलिए ताज़िए के नाम पर होने वाली गलत रस्में, गैर-शरई कार्य, शोर-शराबा, ढोल-ताशे, महिला-पुरुषों का अनावश्यक मिश्रण, बेपर्दगी और अन्य अनुचित कार्य किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किए जा सकते, क्योंकि इससे हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के वास्तविक संदेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।*
उलेमा ने कहा कि यह अत्यंत दुखद विरोधाभास है कि जिस शासक की रक्स और संगीत की प्रवृत्ति के विरुद्ध हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने आवाज़ बुलंद की और सत्य के लिए शहादत स्वीकार की, आज उन्हीं के नाम पर कुछ स्थानों पर डीजे, ढोल-ताशे, संगीत और बेपर्दगी को बढ़ावा दिया जा रहा है। जबकि *हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का पूरा जीवन इन चीजों के ख़िलाफ़ और सत्य, न्याय, सब्र, दृढ़ता और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का महान संदेश देता है।
बैठक में कहा गया कि यदि हम वास्तव में हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से प्रेम और वफादारी का दावा करते हैं तो उनके नाम पर होने वाली गलत रस्मों और समाज को नुकसान पहुंचाने वाली बुराइयों के खिलाफ भी आवाज उठानी होगी। क्योंकि उनका सबसे बड़ा संदेश यही है कि सत्य का साथ दिया जाए और अन्याय, अत्याचार तथा गलत कार्यों का डटकर विरोध किया जाए।
उलेमा ने कहा कि यदि हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से सच्ची मोहब्बत का इज़हार करना है तो इसका सबसे अच्छा तरीका मानव सेवा है। उनके नाम पर मरीजों की सहायता की जाए, गरीबों और जरूरतमंदों की मदद की जाए तथा गरीब बेटियों के विवाह में सहयोग किया जाए।
उन्होंने कहा कि जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नाम पर स्कूल, कॉलेज और शैक्षणिक संस्थान स्थापित करें, जहां कम शुल्क में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जा सके। इससे समाज में शिक्षा, जागरूकता और विकास को बढ़ावा मिलेगा तथा नई पीढ़ी का भविष्य बेहतर होगा।
बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि मुहर्रम के जुलूस शांति, अनुशासन और आपसी सम्मान के साथ निकाले जाएं। जुलूस के दौरान या उसके बाद फैलने वाली गंदगी की सफाई का विशेष प्रबंध किया जाए, ताकि समाज में सकारात्मक संदेश जाए कि हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के मानने वाले केवल दावे नहीं करते, बल्कि सेवा, शिक्षा और स्वच्छता के क्षेत्र में भी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
अंत में उलेमा ने प्रशासन से मांग की कि जनहित, स्वास्थ्य, विद्यार्थियों की शिक्षा, मरीजों के आराम और नवजात बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए डीजे और अनावश्यक शोर-शराबे के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की जाए तथा संबंधित कानूनों का सख्ती से पालन कराया जाए, ताकि समाज में शांति, सौहार्द और स्वस्थ वातावरण बना रहे।
