भारतीय ज्ञान परम्परा में बौद्ध साहित्य का विशेष योगदान : डॉ शर्मा
भिलाई : न्यूज़ 36 : देश-विदेश में सफल सांस्कृतिक-शैक्षणिक भ्रमण कर्त्ता एवं बौद्ध साहित्य में डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त भिलाईवासी आचार्य डॉ.महेश चन्द्र शर्मा ने साँची की अध्ययन यात्रा की। इस दौरान उन्होंने यहां की सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विशेषताओं को विशेष रूप से उल्लेख किया। गौरतलब है कि नई शिक्षा नीति के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परम्परा पर पूरे देश के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और सांस्कृतिक केंद्रों में विचार मंथन चल रहा है। बौद्ध साहित्य भी उसका एक अंग है। सांची में बौद्ध संस्कृति बिखरी पड़ी है। यहां श्रीलंका की महाबोधि सोसायटी द्वारा भगवान बुद्ध का सुन्दर मन्दिर भी बनाया गया है। चैत्य गिरि नाम के ये मंदिर दर्शनीय स्थल है।
कुछ वर्ष पूर्व डॉ.महेश शर्मा ने श्रीलंका की सांस्कृतिक यात्रा में रामायण स्थलों के साथ बौद्ध स्थलों के दर्शन का भी लाभ उठाया। अभी इस यात्रा में एक सुखद संयोग यह हुआ कि डॉ.शर्मा की सांची यात्रा के आसपास अमेरिका से भी विद्यार्थी और प्रोफेसर का समूह यहां शैक्षणिक भ्रमण पर आया।

प्रोफेसर गैब्रिएला निकेलेवा और डॉ.अशोक ओझा के नेतृत्व और मार्गदर्शन में ऐसी सम्भावना व्यक्त की गई कि विश्वगुरु भारत वर्ष की ज्ञान-विज्ञान परंपरा अमेरिका की शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनेगी और भारतीय इतिहास और संस्कृति को पुनः विश्व मंच मिलेगा। उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान परम्परा में बौद्ध दर्शन और साहित्य का योगदान है। इस संदर्भ में विश्व धरोहर सूची में शामिल साँची का विशेष महत्व है। यूनेस्को की उक्त सूची में साँची सर्वोच्च स्थान पर है। यहॉं के बौद्ध स्तूप और स्मारकों की स्थापना का श्रेय महान सम्राट अशोक को है।
स्तूपों के तोरण द्वारों पर भगवान् बुद्ध से जुड़ी जातक कथाओं के चित्रण हैं। यहॉं के चैत्यालय,विहार और संग्रहालय आदि भी दर्शनीय और प्रेरक हैं। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण मंडल भोपाल द्वारा यहां के बौद्ध स्मारकों का अन्वेषण और संरक्षण किया जाता है। साँची बौद्ध भारतीय अध्ययन विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में प्रोफेसर बैद्यनाथ लाभ कार्यरत हैं। आचार्य डॉ.शर्मा की इस यात्रा में हमेशा की तरह परिवार का विशेष सहयोग रहा। उनके साथ श्रीमती रजनी गौरी शर्मा, अंकित शुक्ल, कनिष्ठा शुक्ल, अगस्त्य शुक्ल एवं अद्वैत शुक्ल आदि इस यात्रा से लाभान्वित हुए।
