दुर्ग : न्यूज़ 36 : सत्ता का नशा जब सिर चढ़कर बोलता है, तो जनप्रतिनिधि अपनी मर्यादा भूलकर जनता को ही धमकाने पर उतर आते हैं। इसी का एक उदाहरण दुर्ग नगर निगम की महापौर अलका बाघमार का एक वीडियो इन दिनों शहर में आग की तरह फैल रहा है, जिसमें वे फुटपाथ पर पेट पालने वाले गरीबों को सरेआम यह कहते सुनी जा रही हैं कि— “अगर मेरा हाथ उठ गया… तो एकाध लगा दूंगी मैं।”
यह बयान न केवल एक ‘प्रथम नागरिक’ की गरिमा के खिलाफ है, बल्कि लोकतंत्र में उस आम जनता का अपमान है जिसने उन्हें कुर्सी तक पहुँचाया।
दोहरा मापदंड : गरीबों पर प्रहार, अमीरों पर प्यार?
महापौर का यह गुस्सा केवल उन लाचारों के लिए है जो दो वक्त की रोटी के लिए ठेला लगाते हैं। लेकिन जब बात शहर के बड़े मगरमच्छों की आती है, तो महापौर की ‘शेरनी’ वाली छवि अचानक ‘मौन’ में बदल जाती है।
दुर्ग गणेश मंदिर के सामने करोड़ों की जमीन पर चतुर्भुज राठी का अवैध कब्जा महापौर को दिखाई नहीं देता।
अनुबंध खत्म, कब्जा बरकरार : बस स्टैंड पर वैधानिक समय सीमा समाप्त होने के बाद भी रसूखदारों के कब्जे जस के तस हैं, पर वहां महापौर का “हाथ” नहीं उठता।
ED की छापेमारी और सत्ता की साठगांठ?
हैरानी की बात यह है कि चतुर्भुज राठी, जिनके संस्थानों पर हाल ही में ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने दबिश दी है, ऐसे विवादित व्यापारियों के अवैध कब्जे के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय महापौर का रुख नरम बना हुआ है। शहर की गलियों में चर्चा है कि क्या यह चुप्पी किसी बड़े ‘गठजोड़’ का नतीजा है?
सुशासन को पलीता लगाता अहंकार
एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपनी सादगी और ‘अंत्योदय’ (अंतिम व्यक्ति का विकास) के संकल्प से छत्तीसगढ़ को संवार रहे हैं, वहीं दुर्ग में अलका बाघमार का “एकाध लगा दूंगी” वाला अहंकार सरकार की छवि पर बट्टा लगा रहा है। अपने पार्षदों से बदसलूकी के बाद अब आम जनता पर हाथ उठाने की बात करना यह दर्शाता है कि महापौर अब जनसेवा नहीं, बल्कि ‘राजशाही’ चला रही हैं।
जनता की अदालत में जनप्रतिनिधि
आज दुर्ग की सड़कों पर सवाल तैर रहे हैं। क्या सांसद विजय बघेल, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव और भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुश्री सरोज पाण्डेय जैसी दिग्गज हस्तियां अपनी ही पार्टी की महापौर के इस अमर्यादित व्यवहार का समर्थन करती हैं? जनता की खामोश निगाहें अब आने वाले समय में इस ‘अहंकार’ का जवाब देने को तैयार बैठी हैं।
आज का तीखा सवाल : महापौर जी, हाथ उठाना ही है तो उन भू-माफियाओं पर उठाइए जो शहर की बेशकीमती जमीनें डकार गए हैं, उन गरीबों पर क्या हाथ उठाना जिनकी आजीविका ही आपकी कृपा पर निर्भर है? सत्ता आती-जाती है, पर जनता का दिया हुआ अपमान का घाव कभी नहीं भरता।
