अलग-अलग देशों के लोगों ने साझा की अपने संघर्ष, पहचान और अपनत्व की प्रेरक कहानियां
भिलाई : न्यूज़ 36 : हिंदी-यूएसए सेंट लुइस के संस्थापक मयंक जैन ने एशियन अमेरिकन कहानी-वाचन कार्यक्रम में भाग लिया। यह एक विशेष मंच था जहाँ प्रवासियों और उनके परिवारों ने अपने-अपने देश से आकर यहां अमेरिका में पहचान बनाने तक के संघर्ष, पहचान और अपनत्व की प्रेरक यात्रा साझा कीं। उल्लेखनीय है कि पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर मयंक जैन मूलत: इस्पात नगरी भिलाई के रहने वाले हैं। वर्तमान में वे अमेरिका में हिंदी की सेवा में भी जुटे हैं।
एशियन अमेरिकन कहानी-वाचन कार्यक्रम का आयोजन मिसौरी यूनिवर्सिटी के कैम्बियो सेंटर की ओर से वेबस्टर यूनिवर्सिटी के ब्राउनिंग हॉल ऑडिटोरियम में किया गया था। जिसे एशिया नेटवर्क, मिसौरी ह्यूमैनिटीज तथा वेबस्टर यूनिवर्सिटी के संस्कृति एवं समाज, वैश्विक भाषा विभाग का सहयोग भी प्राप्त हुआ।
इस आयोजन के लिए सेंट लुइस क्षेत्र से 10 प्रतिभागियों का चयन किया गया था। मंच पर जापान, फिलीपींस, चीन, भारत, कोरिया, वियतनाम और ईरान आदि देशों से आए प्रवासियों ने अपनी कहानियां सुनाई, जिसमें सभी ने अपनी-अपनी अनोखी जीवन यात्राएँ साझा कीं। इन विविध अनुभवों ने दिखाया कि अलग-अलग संस्कृतियों से आए लोग किस प्रकार मिलकर अमेरिका और मिसौरी की बदलती हुई सामाजिक पहचान को गढ़ रहे हैं।
मयंक ने बताया-हिंदी माध्यम से पढ़ाई के बाद अंग्रेजी में कैसे खुद को ढाला
मयंक ने यहां मौजूद वैश्विक बिरादरी के समक्ष भिलाई से मिसौरी तक का सफरनामा सुनाया। उन्होंने बताया कि उनकी कहानी भारत के एक छोटे से शहर भिलाई से शुरू होती है, जहाँ हिंदी माध्यम में पढ़ाई करते हुए जीवन का सफर शुरू किया। आगे चलकर भाषा को लेकर द्वंद्व की स्थिति भी आई, जब अंग्रेज़ी के माहौल में खुद को ढालना पड़ा और कई बार उनका आत्मविश्वास भी डगमगाया। समय के साथ समझ आया कि भाषा कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी पहचान की ताकत है। मयंक ने बताया कि उन्हें अमेरिका आने के बाद यह महसूस हुआ कि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा और संस्कृति से दूर होती जा रही है। इसी सोच ने हिंदी स्कूल शुरू करने की प्रेरणा दी, ताकि बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक मंच मिल सके। छोटे से प्रयास ने धीरे-धीरे एक सामुदायिक आंदोलन का रूप ले लिया। आज पीछे मुड़कर देखने पर महसूस होता है कि जिन चुनौतियों को कभी बोझ समझा था, वही सबसे बड़ी सीख और शक्ति बन गईं। मयंक ने कहा कि उनकी यह कहानी सिर्फ व्यक्तिगत संघर्ष की नहीं, बल्कि भाषा, पहचान और समुदाय को जोड़ने की यात्रा की कहानी है।
