Sunday, November 1, 2026

छत्तीसगढ़ी साहित्य के पुरोधा पारकर को मिलेगा लाला जगदलपुरी राज्य अलंकरण

एम.ए. छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम के प्रवर्तक हैं पारकर, लोक संस्कृति, उपन्यास, रंगमंच और अनुवाद में दिया है अविस्मरणीय योगदान

भिलाई : न्यूज़ 36 : छत्तीसगढ़ी भाषा, लोक संस्कृति और साहित्य के संरक्षण एवं संवर्धन में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार दुर्गा प्रसाद पारकर को राज्य सरकार द्वारा ‘लाला जगदलपुरी राज्य अलंकरण’ से सम्मानित किया जाएगा। राजधानी रायपुर में राज्य शासन की ओर से रविवार को इस आशय की घोषणा की गई। 3 नवंबर को राज्योत्सव के समापन अवसर पर उन्हें मुख्य अतिथि गृह मंत्री अमित शाह उन्हें राज्य अलंकरण से सम्मानित करेंगे।
आंचलिक साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला यह प्रतिष्ठित सम्मान न केवल पारकर की बरसों की तपस्या का प्रतिफल है, बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत के लिए गौरव का क्षण है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी को केवल लोक व्यवहार की बोली से उठाकर उच्च शिक्षा, शोध और अकादमिक मंचों पर स्थापित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

एम.ए. छत्तीसगढ़ी के प्रवर्तक और अकादमिक पहचान

पारकर जी का सबसे ऐतिहासिक योगदान पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में ‘एम.ए. छत्तीसगढ़ी’ पाठ्यक्रम प्रारंभ कराने की पहल रही है। इसी भगीरथ प्रयास के कारण उन्हें एम.ए. छत्तीसगढ़ी का ‘प्रवर्तक’ माना जाता है। उनकी कालजयी औपन्यासिक कृति ‘बहू हाथ के पानी’ को हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग और शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, बस्तर के स्नातकोत्तर (एम.ए.) पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, जो छत्तीसगढ़ी की अकादमिक स्वीकार्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

बहुआयामी साहित्यिक अवदान और रचनाएँ

11 मई 1961 को दुर्ग जिले के ग्राम बेलौदी (मालूद) में जन्मे दुर्गा प्रसाद पारकर ने साहित्य की विविध विधाओं में अपनी सृजनात्मकता का लोहा मनवाया है। लोक संस्कृति पर लिखी उनकी किताबें ‘चिन्हारी’ और ‘जस-जंवारा’ छत्तीसगढ़ की जीवनशैली और लोक आस्था का दर्पण हैं। नाटक के क्षेत्र में उन्होंने ‘शिवनाथ’, ‘सुकवा’, ‘चंदा’, ‘सोनचिरई’ और ‘सुराजी गांव’ जैसी कृतियों से लोक रंगमंच को समृद्ध किया। वहीं, उपन्यास विधा में ‘केंवट कुंदरा’, ‘बहू हाथ के पानी’ और ‘दिलासा देवी केवट’ उनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

 अनुवाद, संपादन और पत्रकारिता से भाषायी विस्तार

मौलिक लेखन के साथ-साथ पारकर जी ने मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘निर्मला’ और ‘प्रतिज्ञा’ तथा व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की कृतियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद कर दोनों भाषाओं के बीच सेतु का काम किया। इसके अतिरिक्त, ‘लोक मंजरी’, ‘छत्तीसलोक’ और ‘धरोहर’ जैसी पत्रिकाओं के संपादन के जरिए उन्होंने नए रचनाकारों को मंच प्रदान किया और साहित्यिक आंदोलनों को गति दी।

 मातृभाषा के सम्मान को समर्पित सफर

पूर्व में प्रेम साइमन सम्मान, केयूर भूषण सम्मान और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग सम्मान से अलंकृत पारकर जी की ‘पांच पसर पानी’ (उपन्यास), ‘दू बीजा चांउर’ और बालगीत संग्रह ‘संगवारी’ जल्द ही प्रकाशनाधीन हैं। लाला जगदलपुरी राज्य अलंकरण मिलने की घोषणा से प्रदेश भर के साहित्यकारों और भाषा-प्रेमियों में खुशी की लहर है।
दुर्गा प्रसाद पारकर उन साहित्यकारों में शामिल हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को केवल बोलचाल और लोक व्यवहार की भाषा तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे साहित्य, शोध, उच्च शिक्षा और अकादमिक विमर्श से जोड़ने का निरंतर प्रयास किया। विशेष रूप से पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में एम.ए. छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम प्रारंभ कराने की दिशा में उनकी पहल और सक्रिय भूमिका उन्हें एक अलग पहचान प्रदान करती है। इसी योगदान के लिए उन्हें एम.ए. छत्तीसगढ़ी का प्रवर्तक भी माना जाता है। यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ी भाषा के शैक्षणिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

लोक संस्कृति और जनजीवन के सशक्त रचनाकार

पारकर का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोकजीवन, सामाजिक संरचना, पारिवारिक संबंधों, लोक परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और आम आदमी के संघर्षों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया है। उनकी लेखनी में छत्तीसगढ़ की मिट्टी की गंध, ग्रामीण जीवन की सहजता, लोकमानस की संवेदनाएं और समाज की वास्तविक तस्वीर दिखाई देती है।
उनकी चर्चित कृति ‘चिन्हारी’ छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, परंपराओं और जीवनशैली को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस कृति के माध्यम से उन्होंने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, लोक व्यवहार और सामाजिक जीवन के विविध पक्षों को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान की। इसके अतिरिक्त ‘जस-जंवारा’ जैसी कृति के माध्यम से भी उन्होंने लोक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को साहित्य में स्थान दिया। प्रकाशनाधीन किताबों में सामाजिक समरसता की औपन्यासिक कृति पांच पसर पानी, छत्तीसगढ़ी उपन्यास दू बीजा चांउर, और छत्तीसगढ़ी बालगीत संग्रह ‘संगवारी’ शामिल हैं।

संपर्क-दुर्गा प्रसाद पारकर
‎+91 98274 70653
+91 79995 16642

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