Saturday, June 13, 2026

भिलाई के तीन ट्रैकर ने सफलतापूर्वक पूरा किया एवरेस्ट बेस कैंप ट्रेक

भिलाई : न्यूज़ 36 :  विश्व के सबसे प्रतिष्ठित और चुनौतीपूर्ण ट्रेकों में से एक एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक को भिलाई एवं दुर्ग के तीन ट्रैकर्स ने सफलतापूर्वक पूरा किया। यह साहसिक यात्रा 15 मई को भिलाई, छत्तीसगढ़ से प्रारंभ होकर 1 जून को भिलाई वापसी के साथ पूरी हुई। कुल 18 दिनों की इस यात्रा में प्रतिभागियों ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, अत्यधिक ऊँचाई और प्रतिकूल मौसम का सामना करते हुए अपना लक्ष्य हासिल किया।
इस ट्रैकिंग में खुर्सीपार, भिलाई निवासी कोटेश्वर राव रेलवे चरोदा में पदस्थ हैं और हुडको निवासी श्रीमती मिनिराज ने भाग लिया। दोनों ही यूथ हॉस्टल्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (वाईएचएआई) के लाइफ टाइम सदस्य हैं और वाईएचएआई के अनेक राष्ट्रीय एवं स्थानीय ट्रैक में सहभागिता कर चुके हैं। इनके साथ पदमनाभपुर, दुर्ग निवासी श्रीमती निधि जैन भी शामिल थीं, जो काठमांडू से इस अभियान में जुड़ीं। यह संपूर्ण ट्रेक टैप लाइफ एडवेंचर एंड हाई फाइव कंपनी के माध्यम से संपन्न हुआ।
एवरेस्ट बेस कैंप ट्रेक की शुरुआत नेपाल के लुकला से होती है, जहाँ पहुँचने के लिए काठमांडू से हवाई यात्रा करनी पड़ती है। लुकला एयरपोर्ट दुनिया के सबसे छोटे रनवे और चुनौतीपूर्ण लैंडिंग के लिए प्रसिद्ध है। लुकला से ट्रेक प्रारंभ कर पहले दिन दल ने फाक्डिंग में रात्रि विश्राम किया।
दूसरे दिन ट्रेकर्स नामचे बाजार पहुँचे, जो इस मार्ग का सबसे बड़ा नगर है। विशेष बात यह है कि यहाँ तक पहुँचने के लिए कोई सड़क मार्ग नहीं है और केवल पैदल ट्रेकिंग द्वारा ही पहुँचा जा सकता है। अधिक ऊँचाई के कारण शरीर को वातावरण के अनुरूप ढालने हेतु यहाँ एक अतिरिक्त दिन एक्लाइमेटाइजेशन के लिए रुकना पड़ा। इसी दौरान पहली बार विश्व की सर्वोच्च चोटी एवरेस्ट के दर्शन हुए।
इसके बाद दल देबोचे पहुँचा। मार्ग में विश्व प्रसिद्ध टेंग बेचे मॉनेस्ट्री के दर्शन का अवसर मिला। यह वही ऐतिहासिक बौद्ध मठ है जहाँ प्रथम बार एवरेस्ट फतह करने से पूर्व महान पर्वतारोही तेनजिंग नोरगे और एडमंड हिलेरी भी आशीर्वाद लेने पहुँचे थे। यह मठ अपनी प्राचीनता और भव्यता के लिए प्रसिद्ध है।
देबोचे से आगे बढ़ते हुए दल डिंग बेचे पहुँचा, जहाँ ऊँचाई और अत्यधिक ठंड के कारण शरीर के बेहतर अनुकूलन के लिए एक अतिरिक्त दिन रुकना आवश्यक होता है। इसके पश्चात ट्रेकर्स लोबुचे के लिए रवाना हुए। इस क्षेत्र में पहुँचते-पहुँचते घने जंगल समाप्त हो जाते हैं और केवल छोटी झाड़ियाँ दिखाई देती हैं। कोहरे के बीच ट्रेकिंग का अनुभव अत्यंत रोमांचक रहा।
लिंबाचे में रात्रि विश्राम के बाद दल गोरख शेप पहुँचा। यहाँ आवश्यक सामान लेकर दोपहर भोजन के बाद सभी लंबे समय से प्रतीक्षित लक्ष्य एवरेस्ट बेस कैंप की ओर बढ़े। लगभग तीन घंटे की कठिन पदयात्रा के बाद दल सफलतापूर्वक एवरेस्ट बेस कैंप पहुँच गया।
बेस कैंप पहुँचने की खुशी शब्दों में व्यक्त करना कठिन था। सभी ट्रेकर्स ने एक-दूसरे को गले लगाकर बधाई दी तथा भारतीय तिरंगे के साथ तस्वीर लेकर राष्ट्रध्वज को सलामी दी। यह वह ऐतिहासिक स्थान है जहाँ से विश्व की सर्वोच्च चोटी माउंट एवरेस्ट के लिए पर्वतारोहण अभियानों की शुरुआत होती है। लंबे समय से संजोया गया सपना यहाँ साकार हुआ।
हालाँकि मौसम खराब होने के संकेत मिलते ही दल वापस गोरख शेप लौट आया। लौटने के बाद सभी ने ऊँचाई पर होने वाली समस्याओं का प्रभाव महसूस किया। तेज सिरदर्द और अस्वस्थता के कारण उस रात कोई भी भोजन नहीं कर पाया तथा पूरी रात कठिन परिस्थितियों में बितानी पड़ी। अगली सुबह दल फेरिचे के लिए रवाना हुआ। मार्ग में पुनः लोबुचे और थूकला से होकर गुजरा। नदी किनारे बने सुंदर मार्ग से होते हुए शाम तक सभी फेरिचे पहुँचे।
वापसी यात्रा के अगले दिन दल पुनः नामचे बाजार के लिए रवाना हुआ। मार्ग में देबोचे, टेंगबोचे और फूंकी तांगा से गुजरते हुए सभी ने प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया। वापसी के दौरान वर्षा का भी सामना करना पड़ा, लेकिन शाम तक सभी सुरक्षित रूप से नामचे बाजार पहुँच गए और वहीं रात्रि विश्राम किया।
अगले दिन सुबह नाश्ते के बाद दल लुकला के लिए रवाना हुआ। फाक्डिंग में दोपहर भोजन करने के बाद लगभग 22 किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी कर शाम 6:30 बजे लुकला पहुँचा, जहाँ अंतिम रात्रि विश्राम किया गया।अगली सुबह लंबे इंतजार के बाद लगभग 11 बजे काठमांडू के लिए उड़ान मिली और दोपहर 12 बजे दल काठमांडू पहुँचा। होटल में ठहरने के बाद सभी ने प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन किए। रात्रि विश्राम के उपरांत अगले दिन टैक्सी द्वारा रक्सौल के लिए प्रस्थान किया गया। रक्सौल से अगली सुबह ट्रेन द्वारा दुर्ग होते हुए प्रतिभागी 1 जून को अपने गृह नगर भिलाई लौट आए।
प्रतिभागियों ने बताया कि एवरेस्ट बेस कैंप ट्रेक उनके जीवन का अब तक का सबसे कठिन, चुनौतीपूर्ण एवं यादगार ट्रेक रहा, जिसकी स्मृतियाँ जीवनभर उनके साथ रहेंगी। यह अभियान दृढ़ इच्छाशक्ति, टीम भावना और साहस का उत्कृष्ट उदाहरण है।

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