दुर्ग : न्यूज़ 36 :प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के बाद केंद्र में आई भारतीय जनता पार्टी सरकार ने देश को बदलने की दिशा में कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू कीं। स्वच्छ भारत मिशन से लेकर प्रधानमंत्री आवास योजना तक, इन प्रयासों ने देश के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में उल्लेखनीय बदलाव लाए।
लेकिन इसी क्रम में अब एक नई चिंता उभर रही है — शासकीय आवासों का जनप्रतिनिधियों द्वारा लाभ उठाना, भले ही उनके पास पहले से निजी आवास हों।
भाजपा जनप्रतिनिधियों को मिल रहा प्राथमिकता का लाभ ?
दुर्ग जिले में वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े जनप्रतिनिधियों को शासकीय आवासों का लाभ बड़ी संख्या में मिल रहा है। कई जनप्रतिनिधि ऐसे हैं जिनके पास पहले से निजी बंगलों या आवासीय संपत्तियों के बावजूद भी शासकीय आवास आवंटित हैं, और उनका उपयोग किया जा रहा है।
हालांकि कुछ अपवाद भी हैं। भाजपा की एक वरिष्ठ राष्ट्रीय नेत्री, जिन्होंने लोकसभा और राज्यसभा सांसद, महापौर, विधायक, राष्ट्रीय महासचिव और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे पदों पर कार्य किया है — वर्तमान में जल परिसर स्थित शासकीय आवास में निवास कर रही हैं। उनके पास अन्य कोई निजी निवास नहीं है, जो उन्हें इस सूची में एकमात्र व्यवहारिक पात्र बनाता है।
कांग्रेस शासन में क्यों रही निष्क्रियता ?
यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि कांग्रेस शासनकाल में, जब दुर्ग जिले से मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, पीएचई मंत्री सहित कई वरिष्ठ मंत्री पद पर रहे, तब शासकीय आवासों के आवंटन को लेकर कोई स्पष्ट योजना या तत्परता नहीं दिखाई दी। इसके विपरीत, वर्तमान में भाजपा शासनकाल में इस प्रक्रिया को खुलकर अपनाया गया है और व्यापक स्तर पर शासकीय आवासों का आवंटन हो रहा है।
मृत जनप्रतिनिधियों के नाम पर आवास – अब भी अधीन ?
एक गंभीर उदाहरण स्वर्गीय पूर्व मंत्री हेमचंद यादव से जुड़ा है। उनके निधन के वर्षों बाद भी, उनके नाम पर आवंटित शासकीय आवास आज तक उनके परिवार के अधीन बना हुआ है। यह सवाल खड़ा करता है कि जब वास्तविक उपयोगकर्ता नहीं रहे, तो उस आवास पर अधिकार किस आधार पर कायम है?
नैतिकता पर सवाल
शासकीय आवासों का आवंटन उस स्थिति में स्वीकार्य है जब कोई जनप्रतिनिधि वास्तव में बेघर हो या उसके पास निजी संपत्ति ना हो। लेकिन यदि पहले से संपन्न जनप्रतिनिधि भी सरकारी सुविधा का लाभ लें और पदमुक्त होने के बाद भी आवास न छोड़ें, तो यह केवल नैतिक विफलता नहीं बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग भी है।
भविष्य की आशंका : क्या “जनप्रतिनिधि आवास” बन जाएगा “शासकीय आवास”?
जिस तेज़ी से पद पर रहते हुए शासकीय आवास हथियाए जा रहे हैं और पदमुक्ति के बाद भी उन्हें खाली नहीं किया जा रहा, वह इस बात की चेतावनी है कि कहीं भविष्य में शासकीय आवासों को ही “जनप्रतिनिधि आवास” घोषित न कर दिया जाए।
निष्कर्ष:
अब समय है कि इस पूरे सिस्टम पर गहन पुनर्विचार किया जाए। जनता के संसाधन जनता के लिए हैं, न कि राजनैतिक सुविधा के लिए।
शासकीय आवास उन्हीं लोगों को मिले जिन्हें वास्तव में जरूरत है, न कि उन्हें जो पहले से सक्षम हैं।
📢 जनता को अपने जनप्रतिनिधियों से इस विषय में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करनी चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में यही सबसे बड़ा अधिकार है।
