Sunday, August 31, 2025

मुहर्रम पर कंडरका के हिंदू-मुसलमान उठाते हैं ताजिया, मिलकर गाते हैं मरसिया

जनवादी लेखकों की सद्भाव यात्राएं जारी,सद्भाव के प्रेरक केंद्रों पर  होगा आलेखन

भिलाई : न्यूज़ 36 : छत्तीसगढ़ जनवादी लेखक संघ से जुड़े लेखक छत्तीसगढ़ में साम्प्रदायिक सदभाव के केन्द्र बन चुके गावों और कस्बों में लगातार यात्रा कर प्रेम, एकता और मेल से जुड़े स्थलों के इतिहास से परिचित हो रहे हैं। इन पर सामूहिक लेखन जारी है। जिसका पुस्तक के रूप में प्रकाशन शीघ्र होगा।इसी कड़ी में लेखकों का प्रतिनिधिमंडल गुंडरदेही जिला बालोद पहुंचा। जहां पद्मश्री शमशाद बेगम के सहयोग से यहां की सांस्कृतिक एकता की कहानियों को लेखकों ने जाना। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. परदेशीराम वर्मा ने बताया कि चंडी मंदिर के निर्माता भूतपूर्व जमींदार ठाकुर निहाल सिंह के महल से 1943 से मुहर्रम के आयोजनों की शुरुआत हुई थी। तब से कई बरसों तक मुहर्रम के पूरे 10 दिन तक तमाम आयोजन जमींदार निहाल सिंह के मार्गदर्शन में होते रहे।


लेखकों का प्रतिनिधिमंडल तीसरे पड़ाव में दुर्ग जिले के धमधा तहसील के गांव कंडरका पहुंचा। बावन एकड़ में बने तालाब के लिए प्रसिद्ध गांव कडरका में दस दिन तक आज भी मुहर्रम में हिन्दु-मुसलमान एकजुटता की मिसाल पेश करते हैं।भिलाई इस्पात संयंत्र के पूर्व कर्मचारी मुश्ताक अली (अब दिवंगत) ने गांव में 1975 में मस्जिद बनवाई थी। हिन्दू-मुसलमान घरों से जुड़ी जमीन पर सभी के सद्भाव से यह मस्जिद तैयार हुई है। डॉ परदेशीराम वर्मा ने बताया कि इस गांव के रज्जाक अली प्रसिद्ध हरि कीर्तन गायक थे। उनके सुपुत्र कलाकार शेर अली को रामायणी का खिताब मिला था। शेर अली रामायण समारोहों में गायन करते थे। उन्होंने बताया कि कंडरका में मुहर्रम हिन्दू-मुसलमान दोनों हमेशा से मुजावर रहे हैं। पहले ठाकुर मन्नूलाल राजपूत और बाकर अली यहां मुहर्रम पर सवारी उठाने का दायित्व निभाते थे। अब उन्हीं की संतानों में रघुनंदन सिंह ठाकुर और हुसैन अली इस परंपरा को साथ-साथ निभा रहे हैं। नई पीढ़ी में लियाकत अली, छोटू खान, वीरेन्द्र सिंह ठाकुर, रमजान अली और राजेंद्र साहू सद्भाव के लिए उसी तरह काम करते हैं।

मुहर्रम पर कर्बला के शहीदों की याद में यहां के हिंदू-मुस्लिम मिल कर मरसिया (शोकगीत) गाते हैं और अलाव में भी हिस्सा लेते हैं। हिन्दू बस्ती चेटुवा में एक तालाब में बनी बावली में पंजतन निशान तथा झंडा है।यहां हर साल मुहर्रम पर ‘नाल’ निकाली जाती है। कंडरका गांव के बीचों बीच विशाल नीम पेड़ में स्थित ‘निशान’ को हिन्दू मुस्लिम सभी पीढ़ियों से श्रद्धापूर्वक आदर देते हैं।
डा. वर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ के गावों, कस्बों और शहरों में साम्प्रदायिक सद्भाव की प्रेरक परंपरा है। इसे छत्तीसढ़ और देश के लोग भी जाने यह हम लेखकों ने महसूस किया। इसी सिलसिले में ये यात्राएं जारी हैं। इस अभियान में बद्री प्रसाद पारकर, कमलेश चंद्राकर, मुनीलाल निषाद, अब्दुल कलाम, अशोक आकाश, पद्मश्री शमशाद बेगम, मुहम्मद जाकिर हुसैन, राजेन्द्र साहू, महेश वर्मा, मोहर्रम बेग, शिवकुमार गायकवाड़, केशवराम साहू, पुसऊ खान और गरीबा अली की विशेष सहभागिता रही। यह सिलसिला पूरे छत्तीसगढ़ के विशिष्ट सद्भाव के प्रतीक स्थलों में लगातार चलेगा।

संपर्क-डा. परदेशीराम वर्मा-+91 79 7481 7580

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