न्यूज 36 राजनीति : लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है राजनितिक पार्टी अपनी अपनी तैयारियों में जुट गई। एक तरफ जहां भाजपा इस बार 400 पार नारे के साथ मैदान में उतर रही वही कांग्रेस आम जनता की नाराजगी के दम पर सत्ता में आने की राह देख रही है। कांग्रेस की राह आसान नहीं, संगठन के नाम पर नाराज और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं की फौज कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बन रही है । विरोध प्रदर्शन जैसे आयोजनों में चंद कार्यकर्ताओं की उपस्थिति कांग्रेस की कमजोर स्थिति को दर्शा रही ।
दुर्ग लोकसभा क्षेत्र की बात करें तो दुर्ग लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के प्रबल दावेदार के रूप में राजेन्द्र साहू का नाम प्रमुखता से आने के बाद कांग्रेस में अंदरुनी बहस भी शुरू हो चुकी है । वैसे तो कांग्रेस नेता राजेन्द्र साहू पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी है किंतु पूर्व में निर्दलीय चुनाव एवं विधान सभा लड़कर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने का आरोप भी राजेन्द्र साहू के ऊपर लगना शुरू हो चुका है । वही कांग्रेस के कद्दावर नेता स्व. मोतीलाल वोरा के पुतला दहन की चर्चा भी इन दिनों फिर से सुनने को मिल रही ऐसे में कांग्रेस के अंदरूनी उठापटक भी साफ़ नजर आ रही .
बता दे कि राजेन्द्र साहू के निर्दलीय महापौर चुनाव एवं विधान सभा चुनाव लड़ने के कारण कांग्रेस प्रत्याशी की हार का आरोप भी राजेन्द्र साहू पर लग चुका है वही 2018 विधान सभा चुनाव से पूर्व पुनः कांग्रेस में घर वापसी के बाद संगठन में सक्रिय हुए । तात्कालिक मुख्यमंत्री का करीबी होने का फायदा भी संगठन में मिला । एक समय ऐसा भी था जब युवाओं में अच्छी पकड़ थी पर समय के साथ अब स्थिति बदलती नजर आ रही । वर्तमान समय में दुर्ग लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति काफी कमजोर नजर आ रही है ऐसे में कांग्रेस से बगावत कर महापौर और विधायक का चुनाव लड़ने तथा पुनः कांग्रेस में शामिल हो कर लोकसभा के प्रबल दावेदार बनने से जहा भाजपा की राह आसान नज़र आ रही वही कांग्रेस में अंदरुनी विरोध भी ऐसे लोगो द्वारा आरंभ हो चुका जो सालों से कांग्रेस की राजनीति कर रहे और संगठन के द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करते रहे तथा कांग्रेस के झंडे को थामे हुए आगे बढ़ते रहे ।
वर्तमान समय में पूर्व गृह मंत्री साहू एवम पूर्व साडा उपाध्यक्ष बृज मोहन सिंह ऐसे प्रबल दावेदार हैं जो संगठन के लिए पूरी तरह समर्पित है। कांग्रेस जिसे भी प्रत्याशी घोषित करे किंतु अगर संगठन में एकता का अभाव रहा तो बड़ी बात नहीं कि पूर्व की बड़ी हार का रिकार्ड भी टूट सकता है । केंद्रिय संगठन जिसे भी प्रत्याशी घोषित करे उन्हे यह भी निश्चित करना होगा कि अंदरूनी विरोधाभास को भी खत्म कर एकजुटता का संदेश देना होगा ।